सारांश: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय और निचली अदालत द्वारा दिए गए डीएनए परीक्षण के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा है कि पितृत्व विवादों में जब तक कोई अन्य निर्णायक सबूत न हो, तब तक डीएनए जांच की अनुमति दी जा सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे का जैविक पहचान और विरासत में हिस्सेदारी का अधिकार पिता की निजता से बड़ा है। चतुर्भुज प्रधान बनाम अमर प्रधान मामले में यह निर्णय सुनाया गया, जिसमें संबंध के दावे की पुष्टि के लिए डीएनए परीक्षण अनिवार्य ठहराया गया।
मुकदमे की पृष्ठभूमि
इस पितृत्व विवाद में अमर प्रधान (पहला प्रतिवादी) का दावा है कि वह चतुर्भुज प्रधान (अपीलकर्ता) का जैविक पुत्र है। अमर की माता ने जनवरी 1999 में चतुर्भुज प्रधान के साथ संबंध होने का दावा किया, जिससे अमर का जन्म 10 सितंबर 1999 को हुआ। चतुर्भुज प्रधान ने इन दावों को नकारते हुए उस समय दर्ज बलात्कार (धारा 376 आईपीसी) मामले में मिली बरी का हवाला दिया।
कोर्ट दस्तावेजों के अनुसार, 2003 से 2010 तक दोनों पक्षों के बीच पोषण भत्ता संबंधी कई मुकदमे चले। 2005 में चतुर्भुज की अपील पर उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अमर और उसकी मां ने चतुर्भुज प्रधान से कोई नाता सिद्ध नहीं किया। इस आदेश को अपील में सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया गया और अंत में लोक अदालत में यह फैसला हुआ कि उस समय अमर नाबालिग था और अब वयस्क हो चुका है, अतः भत्ता विवाद समाप्त माना गया।
अमर प्रधान जब वयस्क हुआ, तो उसने बैसना (छत्तीसगढ़) की प्रथम अतिरिक्त सिविल अदालत में पितृत्व घोषित करने और संपत्ति में एक-तिहाई हिस्सेदारी देने की याचिका दायर की (मुकदमा सं. 13A/2019, 21 सितम्बर 2019)। निचली अदालत ने विवाद की सच्चाई उजागर करने के लिए चतुर्भुज प्रधान से डीएनए जाँच कराने का आदेश दिया, जो बाद में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।
न्यायालय का आदेश और प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के तर्क सुने। अपीलकर्ता चतुर्भुज प्रधान ने कहा कि वह मजबूरी में डीएनए जांच नहीं कर सकता और अन्य ठोस साक्ष्य न होने का दावा तथ्यात्मक नहीं है। दूसरी ओर, अमर के पक्ष ने तर्क दिया कि पितृत्व के प्रश्न का स्पष्टीकरण करने का विकल्प शेष नहीं है और ऐसे में वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना न्यायसंगत है. दोनों पक्षों के हितों के संतुलन पर न्यायालय ने ध्यान दिया और पाया कि चतुर्भुज के निजता अधिकार की तुलना में अमर की जैविक पहचान व विरासत का अधिकार अधिक महत्वपूर्ण है।
न्यायालय ने अपने फैसले में याद दिलाया कि डीएनए परीक्षण स्वचालित रूप से नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि वह तभी निर्देशित किया जाए जब पितृत्व ही मुख्य मुद्दा हो और विवाद अन्य प्रमाणों से सुलझ नहीं सकता। अदालत ने कहा कि परीक्षण न कराने की स्थिति में बच्चे को उसके जन्मसिद्ध अधिकारों (जैसे विरासत में हिस्सेदारी) से वंचित रखा जा सकता है। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने चतुर्भुज प्रधान की अपील को ख़ारिज करते हुए निचली अदालतों के डीएनए जांच के आदेश को उचित ठहराया।
निजता vs पहचान
अदालत ने विशेष रूप से कहा कि कोई व्यक्ति अपनी निजता का पूरा अधिकार तो रखता है, लेकिन जब बच्चे को अपने जैविक पिता की पहचान और उसके विरासत के अधिकार नहीं मिल पाते, तो इनकी रक्षा अन्यायपूर्ण होती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ने प्रमाण एवं संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बिठाते हुए स्पष्ट किया कि बच्चे की पहचान की खोज उसके अधिकारों का हिस्सा है और यह निजता के सामान्य अधिकार पर भारी पड़ता है। उक्त आदेश ने यह मान्यता दी कि पितृत्व परीक्षण को एक वैध अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए और इसका उपयोग तभी हो जब अन्य प्रमाण साफ न हों।
निष्कर्ष
चतुर्भुज प्रधान बनाम अमर प्रधान में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने डीएनए परीक्षण की भूमिका को औपचारिक रूप से स्वीकार किया है। यह फैसला पूर्व के कई न्यायनिर्णयों की रीति पर चलता है जिसमें कहा गया कि डीएनए जांच केवल असाधारण परिस्थितियों में ही जरूरी ठहरती है। इस मामले में अदालत ने बच्चे के हितों को वरीयता दी, जिससे एक तरफ परिवारिक विवादों में सत्य की खोज को बल मिलेगा तो दूसरी ओर निजता के अधिकार और कानूनी मानदंडों के बीच संतुलन बना रहेगा। यह फैसला भविष्य में पितृत्व विवादों के निपटारे के लिए एक नए मानदंड की तरह कार्य करेगा।